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गांव खाली होते गए, आंगन सूने होते गए… बुजुर्ग रह गए अकेले
भारत

गांव खाली होते गए, आंगन सूने होते गए… बुजुर्ग रह गए अकेले

ब्यूरो रिपोर्ट | अपडेटेड: 29 Aug, 2026
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    गांव खाली होते गए, आंगन सूने होते गए… बुजुर्ग रह गए अकेले कभी पढ़ाई के लिए शहर गए, फिर नौकरी और रोजगार की तलाश में वहीं बसते चले गए। देखते ही देखते गांव के वे
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    गांव खाली होते गए, आंगन सूने होते गए… बुजुर्ग रह गए अकेले


    कभी पढ़ाई के लिए शहर गए, फिर नौकरी और रोजगार की तलाश में वहीं बसते चले गए। देखते ही देखते गांव के वे घर, जहां कभी बच्चों की आवाजें गूंजती थीं, आज खामोश खड़े हैं। पीछे रह गए हैं बुजुर्ग—यादों, इंतजार और खाली आंगन के साथ।


    गांवों की तस्वीर पिछले कुछ दशकों में तेजी से बदली है। बेहतर शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य सुविधाओं और आधुनिक जीवन की तलाश में युवा पीढ़ी शहरों की ओर निकल गई। शुरुआत में यह सफर कुछ वर्षों के लिए था—“पढ़ाई पूरी करेंगे और वापस लौट आएंगे।” फिर नौकरी मिली, परिवार बना और शहर ही स्थायी ठिकाना बन गया।


    गांव में माता-पिता इंतजार करते रहे।


    पहले त्योहारों पर बच्चे लौटते थे। गर्मियों की छुट्टियों में घर में रौनक होती थी। खेतों में काम के साथ बच्चों की हंसी सुनाई देती थी। दादा-दादी के आसपास पोते-पोतियों की भीड़ रहती थी। लेकिन धीरे-धीरे मुलाकातें कम हुईं और फोन कॉल ने रिश्तों की जगह लेनी शुरू कर दी।


    अब कई घरों के दरवाजे खुले हैं, लेकिन भीतर रहने वाला कोई नहीं। कुछ घरों में सिर्फ बुजुर्ग हैं।


    सुबह उठकर वे आंगन में झाड़ू लगाते हैं, पशुओं को चारा डालते हैं, खेतों की ओर देखते हैं और फिर मोबाइल पर बच्चों की आवाज सुनकर अपने दिन को थोड़ा आसान बना लेते हैं। बेटा कहता है—“पापा, इस बार जरूर आएंगे।” बेटी कहती है—“मां, अपना ध्यान रखना।” लेकिन जिंदगी की भागदौड़ में वह “इस बार” अक्सर अगले त्योहार तक पहुंच जाता है।


    सिर्फ लोग नहीं गए, गांव की रौनक भी चली गई


    पलायन का असर सिर्फ घरों तक सीमित नहीं है। गांव की सामाजिक व्यवस्था भी बदल रही है। जिन गलियों में शाम को बुजुर्गों की चौपाल लगती थी, वहां अब सन्नाटा है। स्कूलों में बच्चों की संख्या घट रही है। कई पारंपरिक काम करने वाले लोग नहीं रहे। खेतों में पहले जैसी हलचल नहीं दिखाई देती।


    कभी गांव में किसी घर में शादी होती थी तो पूरा गांव परिवार बन जाता था। किसी के घर दुख होता था तो हर कोई साथ खड़ा होता था। आज कई जगह पड़ोसी भी एक-दूसरे से दूर होते जा रहे हैं।


    बुजुर्गों की सबसे बड़ी परेशानी अकेलापन


    उम्र बढ़ने के साथ शरीर को सहारे की जरूरत होती है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरत होती है अपनों की मौजूदगी की।


    अकेले रह रहे बुजुर्गों के लिए बीमारी सिर्फ बीमारी नहीं होती। अस्पताल जाना मुश्किल हो सकता है। दवा लेने वाला कोई नहीं होता। बैंक, सरकारी कार्यालय या बाजार का काम भी चुनौती बन जाता है।


    लेकिन सबसे बड़ा दर्द शायद यह नहीं है।


    सबसे बड़ा दर्द है—किसी के घर आने का इंतजार।


    दरवाजे पर आहट होती है तो आंखें उसी दिशा में उठ जाती हैं। सड़क पर कोई गाड़ी रुकती है तो उम्मीद होती है कि शायद बेटा आया हो। फोन बजता है तो चेहरे पर मुस्कान आ जाती है।


    क्योंकि उम्र के इस पड़ाव पर उन्हें महंगे सामान नहीं चाहिए।


    उन्हें चाहिए तो बस अपने लोगों का थोड़ा-सा वक्त।


    क्या शहर जाना गलत है?


    नहीं।


    शिक्षा और रोजगार के लिए शहर जाना गलत नहीं है। हर युवा को अपने बेहतर भविष्य का अधिकार है। समस्या तब पैदा होती है जब विकास की दौड़ में रिश्तों और जिम्मेदारियों को पीछे छोड़ दिया जाता है।


    जरूरत इस बात की है कि गांव छोड़ने वाले लोग गांव से अपना रिश्ता न छोड़ें।


    माता-पिता को समय दें। नियमित फोन करें। संभव हो तो उन्हें अपने साथ रखें या उनकी सुविधा के अनुसार गांव में ही बेहतर व्यवस्था करें। आसपास के रिश्तेदारों और पड़ोसियों से संपर्क बनाए रखें।


    सरकारों और समाज के सामने भी यह सवाल है कि क्या गांवों में शिक्षा, स्वास्थ्य, इंटरनेट और रोजगार की ऐसी सुविधाएं विकसित की जा सकती हैं, जिससे लोगों को मजबूरी में पलायन न करना पड़े?


    गांव सिर्फ जमीन का टुकड़ा नहीं


    गांव हमारे परिवारों की जड़ हैं।


    वहीं किसी ने पहली बार चलना सीखा था। वहीं पिता ने खेत में पसीना बहाया था। वहीं मां ने चूल्हे पर रोटी बनाई थी। वहीं दादा-दादी ने कहानियां सुनाई थीं।


    आज वही आंगन इंतजार कर रहा है।


    शहरों में बड़ी इमारतें खड़ी हो रही हैं, लेकिन गांवों में कई पुराने घर अपने लोगों की राह देख रहे हैं।


    हो सकता है कि रोजमर्रा की जिंदगी में हम इस बदलाव को सामान्य मान लें, लेकिन किसी बुजुर्ग से पूछिए कि अकेले घर में शाम कैसे गुजरती है—तब समझ आएगा कि पलायन सिर्फ गांवों को खाली नहीं करता, यह कई बुजुर्गों की जिंदगी से भीड़ छीन लेता है।


    कभी बच्चे गांव से शहर पढ़ने गए थे…

    फिर रोजगार के लिए वहीं रुक गए…

    और अब गांव में बची हैं उनकी बचपन की यादें और माता-पिता की आंखों में उनका इंतजार।


    शायद विकास की असली तस्वीर वही होगी, जहां युवा आगे बढ़ें, शहरों में सफलता हासिल करें—लेकिन अपने गांव और अपने बुजुर्गों से उनका रिश्ता कभी खत्म न हो।

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