: सुक्खू-प्रतिभा की खींचतान के बीच हाईकमान का ‘मास्टरस्ट्रोक’, कुलदीप राठौर फिर संभालेंगे हिमाचल कांग्रेस की कमान!
शिमला, 16 अक्टूबर 2025:
हिमाचल प्रदेश की सियासत में एक बड़े उलटफेर के संकेत मिल रहे हैं। सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस हाईकमान ने प्रदेश में पार्टी के भीतर चल रही अंतर्कलह और गुटबाजी पर लगाम लगाने के लिए एक बड़ा फैसला लिया है। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष कुलदीप सिंह राठौर को एक बार फिर हिमाचल प्रदेश कांग्रेस कमेटी (HPCC) के मुखिया का पद सौंपा जाना लगभग तय हो गया है। यह फैसला मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू और मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष प्रतिभा सिंह के खेमों के बीच चल रही सत्ता की खींचतान को संतुलित करने के एक रणनीतिक प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।
क्यों पड़ी राठौर की जरूरत?
जब से हिमाचल में कांग्रेस की सरकार बनी है, तब से ही संगठन और सत्ता के बीच एक महीन सी दरार लगातार चौड़ी होती जा रही है। एक तरफ मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू का खेमा है, जो सरकार पर अपनी पकड़ मजबूत बनाए हुए है, तो दूसरी तरफ ‘होली लॉज’ का दबदबा और वीरभद्र सिंह की विरासत को आगे बढ़ा रहीं सांसद और प्रदेश अध्यक्ष प्रतिभा सिंह का गुट है। दोनों खेमों के बीच की तनातनी कई मौकों पर सार्वजनिक रूप से सामने आ चुकी है, जिससे सरकार के कामकाज और पार्टी की छवि पर नकारात्मक असर पड़ रहा है।
पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “हाईकमान इस गुटबाजी से बेहद चिंतित है। लोकसभा चुनावों में मिली हार और आगामी पंचायत व विधानसभा चुनावों (2027) को देखते हुए एक ऐसे अध्यक्ष की जरूरत महसूस की जा रही थी, जो दोनों गुटों के बीच पुल का काम कर सके और संगठन को फिर से जमीन पर मजबूत करे। कुलदीप राठौर इस भूमिका के लिए सबसे उपयुक्त चेहरा माने जा रहे हैं।”
राठौर ही क्यों?
कुलदीप सिंह राठौर का पिछला कार्यकाल संगठनात्मक मजबूती के लिए जाना जाता है। उन्होंने अध्यक्ष रहते हुए पार्टी के कार्यकर्ताओं को एकजुट करने और बूथ स्तर तक संगठन को सक्रिय करने का काम किया था। उनकी छवि एक शांत, सुलझे हुए और गुटबाजी से ऊपर उठकर काम करने वाले नेता की रही है।
संतुलन साधने में माहिर: राठौर न तो सुक्खू के कट्टर विरोधी माने जाते हैं और न ही ‘होली लॉज’ के करीबी। उनकी नियुक्ति से दोनों खेमों को यह संदेश जाएगा कि हाईकमान किसी एक गुट को तरजीह नहीं दे रहा है।
संगठनात्मक अनुभव: उनके पास संगठन चलाने का लंबा अनुभव है, जो इस समय पार्टी के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है।
कार्यकर्ताओं से जुड़ाव: राठौर का सीधा जुड़ाव ब्लॉक और जिला स्तर के कार्यकर्ताओं से रहा है, जिससे संगठन में एक नया जोश भरने में मदद मिल सकती है।
आगे की राह नहीं आसान
हालांकि, कुलदीप राठौर के लिए यह दूसरी पारी कांटों के ताज से कम नहीं होगी। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती मुख्यमंत्री सुक्खू और प्रतिभा सिंह-विक्रमादित्य सिंह के बीच संतुलन स्थापित करना होगा। उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि सरकार और संगठन के बीच तालमेल बना रहे। कार्यकर्ताओं में पनप रही निराशा को दूर कर उन्हें एकजुट करना और भाजपा के आक्रामक विपक्ष का मुकाबला करने के लिए पार्टी को तैयार करना उनकी मुख्य प्राथमिकताओं में शामिल होगा।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राठौर की वापसी कांग्रेस हाईकमान का एक सोचा-समझा कदम है, जिसका उद्देश्य 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले घर को दुरुस्त करना है। अब देखना यह होगा कि क्या कुलदीप राठौर इस ‘मास्टरस्ट्रोक’ को सफलता में बदल पाते हैं या गुटबाजी की बेड़ियां उनके इरादों पर फिर से भारी पड़ती हैं।
Nation News Desk
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