किलर कफ सीरप: 53 साल पहले चेन्नई में हुई थी 15 बच्चों की मौत, आज मध्य प्रदेश में वही कहानी; 5 दशकों में भी क्यों नहीं जागा सरकारी तंत्र?
नई दिल्ली/भोपाल, 10 अक्टूबर 2025
आज से 53 साल पहले, 1972 में चेन्नई (तत्कालीन मद्रास) के एक अस्पताल में एक जहरीले कफ सीरप ने 15 बच्चों की जान ले ली थी। उस त्रासदी ने देश को झकझोर दिया था, लेकिन ऐसा लगता है कि सरकारी तंत्र ने उस घटना से कोई सबक नहीं सीखा। आधी सदी बाद, इतिहास खुद को दोहरा रहा है। आज मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा और बैतूल जिलों में मातम पसरा है, जहां तमिलनाडु की एक कंपनी के “कोल्ड्रिफ” कफ सीरप को पीने से अब तक 19 बच्चों की दर्दनाक मौत हो चुकी है। कई अन्य बच्चे नागपुर के अस्पतालों में जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे हैं।
यह घटना सिर्फ एक त्रासदी नहीं, बल्कि भारत की दवा रेगुलेटरी प्रणाली पर एक गंभीर और चुभता हुआ सवाल है। यह पूछती है कि 53 सालों के लंबे अंतराल के बाद भी हमारा सिस्टम क्यों इतना लचर और कमजोर है कि जहरीली दवाएं मासूमों की जान ले रही हैं?
छिंदवाड़ा-बैतूल में क्या हुआ?
मामले की शुरुआत तब हुई जब मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा और बैतूल के ग्रामीण इलाकों में बच्चों को सर्दी-खांसी के लिए स्थानीय दवा दुकानों से “कोल्ड्रिफ कफ सीरप” दिया गया। यह सीरप तमिलनाडु के कांचीपुरम में स्थित श्रीसन फार्मास्यूटिकल्स (Srisan Pharmaceuticals) द्वारा बनाया गया था। सीरप पीने के कुछ ही घंटों बाद बच्चों की तबीयत बिगड़ने लगी। उन्हें उल्टियां, पेट दर्द और किडनी फेलियर के लक्षण दिखने लगे, जिसके बाद उन्हें स्थानीय अस्पतालों और फिर गंभीर हालत में नागपुर रेफर किया गया।
जांच में पता चला कि इस कफ सीरप में डायएथिलीन ग्लाइकॉल (Diethylene Glycol – DEG) नामक एक जहरीले रसायन की मिलावट थी। यह एक औद्योगिक विलायक है जिसका इस्तेमाल पेंट और एंटीफ्रीज में किया जाता है। यह इंसानों के लिए, खासकर बच्चों के लिए, जानलेवा है और सीधे किडनी और नर्वस सिस्टम पर हमला करता है। अब तक 19 बच्चों की मौत की पुष्टि हो चुकी है, और यह आंकड़ा बढ़ने की आशंका है।
53 साल पुरानी त्रासदी: जब चेतावनियों को किया गया नजरअंदाज
यह कहानी दर्दनाक रूप से 1972 की घटना की याद दिलाती है। चेन्नई के एग्मोर चिल्ड्रन हॉस्पिटल में भी ठीक ऐसा ही हुआ था। वहां भी एक दवा कंपनी द्वारा बनाए गए कफ सीरप में डायएथिलीन ग्लाइकॉल की मिलावट पाई गई थी, जिससे 15 बच्चों की मौत हो गई थी। उस घटना के बाद भी जांच हुई, समितियां बनीं और दवा कानूनों को सख्त करने के वादे किए गए। लेकिन सवाल उठता है कि उन वादों का क्या हुआ?
क्यों बार-बार फेल होता है सिस्टम?
दवा निर्माण एक बेहद संवेदनशील प्रक्रिया है, जिसमें जरा सी चूक जानलेवा हो सकती है। भारत दुनिया में जेनेरिक दवाओं का सबसे बड़ा उत्पादक है, लेकिन बार-बार होने वाली ऐसी घटनाएं इसकी छवि पर बट्टा लगाती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, इस विफलता के पीछे कई कारण हैं:
कमजोर रेगुलेशन और निरीक्षण: देश भर में हजारों दवा कंपनियां हैं, लेकिन उनकी नियमित और औचक जांच के लिए ड्रग इंस्पेक्टरों की भारी कमी है। कई राज्यों में तो सालों तक फैक्ट्रियों का निरीक्षण ही नहीं होता।
कच्चे माल की अनियंत्रित आपूर्ति: दवा बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल (API) की गुणवत्ता की जांच का कोई पुख्ता सिस्टम नहीं है। कई छोटी कंपनियां सस्ते और घटिया सप्लायरों से कच्चा माल खरीद लेती हैं, जैसा कि इन मामलों में प्रॉपिलीन ग्लाइकॉल की जगह सस्ते डायएथिलीन ग्लाइकॉल का इस्तेमाल किया गया।
जवाबदेही का अभाव: जब ऐसी घटनाएं होती हैं, तो कंपनी का लाइसेंस रद्द करने या कुछ अधिकारियों को निलंबित करने से ज्यादा कुछ नहीं होता। कंपनी के मालिकों और जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्त आपराधिक कार्रवाई के मामले दुर्लभ हैं, जिससे कोई निवारक डर पैदा नहीं होता।
राज्य और केंद्र के बीच समन्वय की कमी: दवा रेगुलेशन राज्य और केंद्र, दोनों की जिम्मेदारी है। लेकिन अक्सर दोनों के बीच समन्वय की कमी के कारण कंपनियां खामियों का फायदा उठाकर घटिया दवाएं बाजार में उतार देती हैं।
गाम्बिया, उज्बेकिस्तान और अब भारत में अपने ही बच्चों की मौतें यह साबित करती हैं कि यह समस्या किसी एक कंपनी या एक बैच तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे सिस्टम में गहरी जड़ें जमा चुकी है। जब तक दवा निर्माण से लेकर उसकी बिक्री तक हर स्तर पर कठोर जांच और दोषियों के लिए सख्त सजा का प्रावधान नहीं होगा, तब तक 1972 से 2025 तक का यह जानलेवा सिलसिला शायद ही रुके।
Nation News Desk
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