बादशाह की अधूरी ख्वाहिशें और फकीर का सुकून
बहुत समय पहले, यमुना के किनारे एक विशाल सल्तनत थी, जिसके बादशाह थे शहज़ाद खान। बादशाह के पास सब कुछ था—सोने से भरे तहखाने, मीलों तक फैली ज़मीनें, हज़ारों की फ़ौज और एक आलीशान महल, जिसकी मीनारें बादलों से बातें करती थीं।
लेकिन, इतनी दौलत के बावजूद, बादशाह के दिल में सुकून नहीं था। उनकी ख्वाहिशों का प्याला कभी नहीं भरता था। अगर वह एक जंग जीतते, तो उन्हें अगली सल्तनत फतह करने की फिक्र सताती। अगर वह सबसे महंगा हीरा खरीदते, तो उन्हें उससे भी बड़े हीरे की तलाश शुरू हो जाती। वह अक्सर रात में अपने मखमली बिस्तरों पर करवटें बदलते रहते, हमेशा किसी न किसी चीज़ की कमी में।
उसी सल्तनत के बाहर, नदी के दूसरे छोर पर, एक छोटी सी कुटिया में एक फकीर रहता था, जिसका नाम था ‘मौला’। मौला के पास बर्तनों के नाम पर एक मिट्टी का प्याला और ओढ़ने के लिए एक फटा-पुराना कंबल था। वह दिन भर ध्यान में रहता या फिर नदी किनारे बैठकर बहते पानी को देखता।
एक दिन, बादशाह शहज़ाद खान अपने वज़ीरों के साथ शिकार से लौट रहे थे। उनकी नज़र उस फकीर पर पड़ी, जो आँखें बंद किए, चेहरे पर एक गहरी मुस्कान लिए बैठा था। बादशाह को बड़ा ताज्जुब हुआ।
वह घोड़े से उतरे और फकीर के पास जाकर कड़क आवाज़ में बोले, “ऐ फकीर, तुम इतने खुश नज़र आ रहे हो! क्या तुम्हें पता नहीं कि तुम्हारे सामने सल्तनत का बादशाह खड़ा है?”
फकीर ने धीरे से आँखें खोलीं और मुस्कुरा कर कहा, “बादशाह को मेरा सलाम। मैं खुश नहीं, मैं शुक्रगुज़ार हूँ।”
बादशाह ने ठहाका लगाया। “शुक्रगुज़ार? किस बात के? इस फटी चादर के लिए या इस खाली प्याले के लिए? मेरे महल में आओ और देखो शुक्रगुज़ारी किसे कहते हैं। मेरे पास वह सब है जो तुम सात जन्मों में भी नहीं सोच सकते।”
फकीर ने शांति से जवाब दिया, “बादशाह सलामत, आप सही कहते हैं। लेकिन मेरी और आपकी एक बुनियादी ज़रूरत एक जैसी है—पेट की भूख।”
शाम ढल रही थी। फकीर ने अपना मिट्टी का प्याला उठाया और पास के गांव की ओर चल पड़ा। कुछ ही देर में, कोई उसे एक सूखी रोटी दे गया, तो किसी ने थोड़ा सा साग। फकीर वापस अपनी कुटिया में आया, नदी के पानी से हाथ धोए और उस सूखी रोटी को बड़े इत्मीनान से खाने लगा। हर टुकड़े के साथ वह कहता, “शुक्र है मौला।”
बादशाह यह सब देख रहे थे। उन्होंने अपने वज़ीर को इशारा किया। वज़ीर ने फौरन सोने की थाली में 56 भोग (तरह-तरह के पकवान) पेश किए।
बादशाह ने कहा, “फकीर, यह सूखी रोटी छोड़ो और यह शाही भोजन करो।”
फकीर ने हाथ जोड़ दिए। “माफ़ करें, बादशाह। मेरा पेट इस एक रोटी से भर गया है। मेरा पेट खाली नहीं रहा।”
उसी पल, महल से एक हरकारा (संदेशवाहक) दौड़ता हुआ आया। वह हाँफते हुए बोला, “बादशाह सलामत, गज़ब हो गया! पड़ोसी मुल्क के शहंशाह ने समंदर से निकला ‘कोह-ए-ज़मुरद’ नाम का एक ऐसा हीरा हासिल कर लिया है, जो हमारे ‘कोह-ए-नूर’ से भी दोगुना बड़ा है!”
यह सुनते ही बादशाह शहज़ाद खान के चेहरे का रंग उड़ गया। उनके हाथ से निवाला छूट गया। जो इत्मीनान उनके चेहरे पर था, वह बेचैनी में बदल गया। उन्होंने फौरन अपने सेनापति को बुलाया और उस हीरे को हासिल करने की तरकीबें सोचने लगे। उनकी भूख मर चुकी थी।
फकीर, जो अपनी रोटी खत्म कर चुका था, बादशाह के पास आया और बोला, “बादशाह सलामत, देखा आपने?”
“क्या मतलब?” बादशाह ने गुस्से से पूछा।
फकीर ने मुस्कुराते हुए कहा:
“पेट फकीर का भी खाली नहीं रहता (मुझे एक रोटी मिली और मेरा पेट भर गया, मैं संतुष्ट हो गया)।”
“…और ख्वाहिशें बादशाह की भी पूरी नहीं होतीं (आपके सामने 56 भोग थे, लेकिन एक नए हीरे की ख्वाहिश ने आपकी भूख ही मार दी)।”
फकीर ने आगे कहा, “सल्तनत आपकी हो, पर सुकून मेरा है। क्योंकि मेरे पास जो है, मैं उसका शुक्र अदा करता हूँ, और आप उस चीज़ के लिए परेशान हैं, जो आपके पास नहीं है।”
बादशाह शहज़ाद खान उस रात महल तो लौट आए, लेकिन उन्हें पहली बार अपनी सबसे बड़ी गरीबी का एहसास हुआ—’ख्वाहिशों की गरीबी’।
कहानी का सार यही है कि खुशी ‘और ज्यादा’ पाने में नहीं, बल्कि ‘जो है’ उसके लिए शुक्रगुज़ार होने में है।
