बिहार का सियासी चक्रव्यूह: पटना का रास्ता
शीर्षक: पटना की गद्दी: हवा का रुख
चुनाव का बिगुल बज चुका था और पटना की फिज़ा में एक अजीब सी खामोशी, एक तनाव घुल गया था। यह सिर्फ एक चुनाव नहीं था; यह बिहार की आत्मा का संग्राम था।
एक तरफ थे मुख्यमंत्री, 70 वर्षीय धरमवीर सिंह। पाँच साल “सुशासन” और “विकास” के नाम पर सरकार चलाने के बाद, वह अपनी जीत को लेकर आश्वस्त थे। पटना के आलीशान बंगले में बैठे, उनके रणनीतिकार उन्हें बता रहे थे, “सर, सड़कें बन गईं, बिजली 20 घंटे आ रही है। जनता विकास को वोट देगी।” धरमवीर सिंह मुस्कुराए, उन्हें भी यही लगता था।
दूसरी तरफ था 35 वर्षीय, तेज-तर्रार और सोशल मीडिया पर हावी, ‘क्रांति’ का चेहरा – प्रभात रंजन। प्रभात की रैलियों में भीड़ उमड़ रही थी। वह विकास नहीं, “सम्मान” और “बदलाव” की बात कर रहा था। उसका नारा था – “हमें सड़क नहीं, रोज़गार चाहिए! हमें बिजली नहीं, सम्मान चाहिए!”
असली खेल पटना के बंगलों में नहीं, बल्कि मुज़फ़्फ़रपुर के किसी गाँव की चाय की दुकान पर खेला जा रहा था।
“का हो रामखेलावन? ई बार हवा केने बा?” (क्या रामखेलावन? इस बार हवा किस तरफ है?) – एक बूढ़े चचा ने खैनी मलते हुए पूछा।
रामखेलावन ने चाय का घूंट लिया, “चचा, कहल मुश्किल बा। ‘राजा’ (धरमवीर सिंह) काम तो किया है, लेकिन ‘नया लइका’ (प्रभात) जातियों को जोड़ रहा है। हमारा जात का लड़का है, सोच रहे हैं…”
बात अधूरी रह गई, लेकिन संदेश स्पष्ट था। बिहार में विकास की चमचमाती सड़क पर भी, राजनीति की गाड़ी जाति के पहियों पर ही दौड़ती थी।
धरमवीर सिंह के मुख्य रणनीतिकार, मिश्रा जी, शाम को एक बंद लिफाफा लेकर सीएम आवास पहुँचे।
“सर, ज़मीनी रिपोर्ट अच्छी नहीं है,” मिश्रा जी ने घबराते हुए कहा।
धरमवीर सिंह चौंके, “क्या मतलब? हमारी रैलियों में तो भीड़…”
मिश्रा जी ने उन्हें टोका, “भीड़ आपकी है, पर वोट नहीं। प्रभात ने ‘पिछड़ा-अतिपिछड़ा’ और ‘अगड़ा-दलित’ के बीच एक नया समीकरण बना दिया है। हमारा कोर वोटर भी खिसक रहा है। लोग आपकी बिजली से टीवी पर प्रभात का भाषण देख रहे हैं।”
यही बिहार की विडंबना थी।
अगले 48 घंटों में पटना में जो हुआ, वह किसी राजनीतिक थ्रिलर से कम नहीं था। धरमवीर सिंह ने अपनी सारी विकास की बातें ताक पर रख दीं। अब खेल ‘मैनेजमेंट’ का था।
मिश्रा जी ने अपनी चाल चली। उन्होंने प्रभात के गठबंधन में शामिल एक छोटे, लेकिन प्रभावशाली ‘महादलित’ नेता से संपर्क किया। रात के अँधेरे में गाड़ियाँ दौड़ीं, वादे हुए।
वोटिंग से दो दिन पहले, उस महादलित नेता ने “सम्मान न मिलने” का आरोप लगाते हुए प्रभात का साथ छोड़ दिया और “तीसरा मोर्चा” बना कर अकेले लड़ने की घोषणा कर दी।
प्रभात रंजन स्तब्ध थे। यह एक सीधा झटका था। उनका ‘सोशल इंजीनियरिंग’ का किला ढह गया था। जो वोट एक साथ पड़ने थे, वे अब बँटने वाले थे।
…
मतगणना का दिन।
सुबह 10 बजे तक, प्रभात रंजन की पार्टी 125 सीटों पर आगे थी। बहुमत के लिए 122 चाहिए थे। पटना में पटाखे फूटने लगे, प्रभात के समर्थक सड़कों पर उतर आए। “नया बिहार, नया मुख्यमंत्री!” के नारे लगने लगे।
लेकिन धरमवीर सिंह अपने कमरे में शांत बैठे थे। मिश्रा जी बस मुस्कुरा रहे थे।
दोपहर 2 बजे तक खेल बदल गया। जैसे-जैसे ग्रामीण इलाकों से वोट आने लगे, गिनती धीमी हो गई। 30 सीटें ऐसी थीं, जहाँ हार-जीत का अंतर 500 वोटों से भी कम था।
शाम 5 बजे तक तस्वीर साफ हुई।
धरमवीर सिंह की पार्टी को 110 सीटें मिलीं।
प्रभात रंजन के गठबंधन को 115 सीटें मिलीं।
और वह ‘तीसरा मोर्चा’ बनाने वाले महादलित नेता? उनकी पार्टी ने 8 सीटें जीत ली थीं।
पटना में सन्नाटा छा गया। किसी को बहुमत नहीं मिला। सरकार अब उस ‘बागी’ नेता के हाथ में थी, जिसके पास सिर्फ 8 विधायक थे।
अगले दिन की सुर्खियाँ थीं: “बिहार में त्रिशंकु विधानसभा! ‘किंगमेकर’ बने बागी नेता।”
रामखेलावन की चाय की दुकान पर फिर बहस छिड़ी।
“देखा चचा! ई सब मिलल बा (ये सब मिले हुए हैं)। हमरा वोट बर्बाद हो गया।”
चचा ने खैनी की नई पिंच उठाई और बोले, “पगला! बिहार में वोट बर्बाद ना होला। ईहां असली खेल तो वोटिंग के बाद शुरू होला। अब देख, पटना में ‘विकास’ और ‘बदलाव’ दोनों ‘किंगमेकर’ के दरवाज़े पर नाक रगड़ रहे हैं। जे सबसे बढ़िया ‘सम्मान’ देई, उहे सरकार बनाई।”
और ठीक वैसा ही हुआ। दो दिन बाद, उसी ‘बागी’ नेता ने “बिहार में स्थिरता” के नाम पर धरमवीर सिंह को समर्थन दे दिया और खुद ‘उप-मुख्यमंत्री’ बन गया।
धरमवीर सिंह फिर से मुख्यमंत्री थे, लेकिन असली जीत मिश्रा जी की ‘सोशल इंजीनियरिंग’ की हुई थी। प्रभात का ‘बदलाव’ अगले पाँच साल के लिए टल गया था। हवा का रुख, रातों-रात बदल दिया गया था।
