दिल्ली प्रदूषण: साँस भी ज़हर, पानी भी ज़हर!
दिल्ली की सुबहें अब मखमली धुंध से नहीं, बल्कि ज़हरीले धुएँ के गुबार से शुरू होती थीं। नवंबर का महीना आते ही, शहर एक ऐसे गैस चैंबर में बदल जाता, जहाँ हर साँस के साथ फेफड़ों में कुछ अनजान कण जमा होते चले जाते।
आज भी कुछ ऐसा ही था।
मीरा ने सुबह उठते ही खिड़की खोली, लेकिन ताज़ी हवा का झोंका आने की बजाय, एक घुटन भरी गंध और धुंधली तस्वीर ही सामने आई। “उफ्फ, फिर वही,” वह बड़बड़ाई। उसके फ़ोन पर AQI ऐप लाल निशान पर चमक रहा था, ‘बहुत खराब’। यह उसकी सुबह की कॉफी का कड़वा घूंट था।
उसका 8 साल का बेटा, आर्यन, आजकल रात को खाँसता रहता था। डॉक्टर ने कहा था कि यह प्रदूषण का असर है। मीरा हर सुबह आर्यन को स्कूल भेजने से पहले दो बार सोचती थी।
आज उसे दफ्तर जाने के लिए यमुना पार करनी थी। वह अक्सर कालिंदी कुंज के पुल से होकर जाती थी, और रोज़ यमुना की बदहाली देखती थी। लेकिन आज का नज़ारा कुछ और ही था।
जैसे ही उसकी कैब पुल पर पहुँची, मीरा की नज़रें ठिठक गईं।
नदी नहीं थी, सिर्फ़ एक विशाल, बदरंग, और बदबूदार झाग का दरिया था। सफ़ेद, मटमैला झाग मीलों तक फैला हुआ था, ऐसा लग रहा था मानो किसी ने नदी पर ज़हर की मोटी चादर बिछा दी हो। सूरज की किरणें उस झाग पर पड़कर एक अजीब सी चमक पैदा कर रही थीं, जो डरावनी लग रही थी।
“हे भगवान!” मीरा के मुँह से निकला।
ड्राइवर ने कहा, “मैडम, यह तो रोज़ का हो गया है। दिवाली के बाद और बढ़ गया है।”
मीरा ने अपनी खिड़की का शीशा बंद कर लिया, लेकिन बदबू हवा में घुल कर कैब के अंदर तक आ रही थी। उसे लगा जैसे उसकी आँखों में जलन हो रही है और सीने में भारीपन बढ़ गया है।
यह सिर्फ़ हवा का ज़हर नहीं था, यह पानी का भी ज़हर था। दिल्ली को दोहरी मार पड़ रही थी। एक तरफ़ आँखों में जलन पैदा करने वाला, फेफड़ों को निचोड़ने वाला धुँआ, और दूसरी तरफ़ यह यमुना का ज़हरीला झाग, जो चीख-चीख कर बता रहा था कि हमने अपनी नदियों को कितना गंदा कर दिया है।
उसे आर्यन का चेहरा याद आया। वह उसे कैसी दिल्ली दे रही थी? एक ऐसी दिल्ली जहाँ साँस लेने के लिए संघर्ष करना पड़ता था, और जहाँ नदियाँ सिर्फ़ ज़हर उगलती थीं।
कैब आगे बढ़ गई, लेकिन वह झाग भरा नज़ारा मीरा की आँखों में बस गया। यह सिर्फ़ एक नदी या एक शहर का प्रदूषण नहीं था। यह एक चेतावनी थी। एक ऐसी चेतावनी, जो हर सुबह धुएँ के रूप में आसमान से गिरती थी, और हर शाम ज़हरीले झाग के रूप में नदी से उठती थी।
दिल्ली साँस भी ज़हर ले रही थी, और पानी भी ज़हर बन चुका था।
Nation News Desk
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