सूखा: आसमान की ओर टकटकी
शीर्षक: तपती ज़मीन, प्यासी निगाहें
जेठ का महीना था। गया ज़िले के बेलागंज गाँव में सूरज आग उगल रहा था। सुबह के दस बजे ही लू के थपेड़े चलने लगते, जैसे कोई अदृश्य राक्षस धरती को झुलसा देना चाहता हो।
गाँव के सबसे पुराने बरगद के नीचे चौपाल सूनी पड़ी थी। जानवर हाँफ रहे थे और पक्षियों ने चहकना बंद कर दिया था। खेत, जो इस समय धान की रोपाई के लिए तैयार होने चाहिए थे, किसी बूढ़े के झुर्रीदार गालों की तरह फट चुके थे। दरारों इतनी चौड़ी थीं कि उनमें एक हाथ समा जाए।
“ई का हो रहल बा, रघूबीर?” 70 साल के भोला महतो ने अपनी सूखी, पथराई आँखों से आसमान की ओर देखते हुए कहा। आसमान, जो किसी धोबी के चादर सा एकदम साफ, नीला और बेदाग था।
रघूबीर, जो गाँव का सबसे पढ़ा-लिखा किसान माना जाता था, ने अपने माथे का पसीना पोंछा। “का कहें चचा… टीवी वाला सब तो कह रहा था कि मानसून बरियार (मज़बूत) आएगा। लेकिन ई तो दगा दे गया।”
सूखा सिर्फ फसल का नहीं था। यह धैर्य का, उम्मीद का और रिश्तों का भी सूखा था।
गाँव का कुआँ पाताल छूने को बेताब था। औरतें सुबह चार बजे से लाइन में लगतीं, तब जाकर बाल्टी भर कीचड़ मिला पानी नसीब होता। उस पानी को छान-छान कर पीते-पीते बच्चों के पेट खराब हो गए थे।
इसी बीच, गाँव के दूसरे छोर पर तनाव बढ़ रहा था। वहाँ सिर्फ एक सरकारी हैंडपंप था, जो अभी भी थोड़ा-बहुत पानी दे रहा था।
“हम पहले आए थे! हमारी बाल्टी पहले लगेगी!” एक औरत चिल्लाई।
“काहे? तुम ही पानी भरोगी? हमारे मवेशी प्यासे मर रहे हैं!” दूसरी आवाज़ आई।
देखते-देखते बात हाथापाई तक पहुँच गई। दो घड़े फूट गए और कीमती पानी तपती धूल में समा गया।
शाम को जब सूरज ढलने लगा, तो आसमान में एक अजीब सा पीलापन छा गया। रघूबीर अपनी झोपड़ी के बाहर खटिया पर लेटे थे। उनकी बेटी मुन्नी, जो सिर्फ आठ साल की थी, एक खाली लोटा लिए आई।
“बाबू, प्यास लगी है।”
रघूबीर का कलेजा फट गया। घर में पीने के लिए सिर्फ एक घड़ा पानी बचा था, जिसे उसकी पत्नी ने कल के लिए बचा कर रखा था।
वह उठे, अपनी पगड़ी कसी और बिना कुछ कहे घर से निकल पड़े। वह 10 किलोमीटर दूर, शहर की तरफ पैदल चल दिए, सिर्फ इसलिए ताकि वह अपने कंधों पर पानी के दो बड़े कनस्तर लाद कर ला सकें।
जैसे ही वह गाँव की सरहद पार कर रहे थे, उन्होंने फिर आसमान की ओर देखा। दूर क्षितिज पर, एक छोटा सा, काला धब्बा नज़र आया।
“बादल?” उन्होंने खुद से पूछा। उनकी चाल तेज़ हो गई।
अगले दो घंटे तक वह चलते रहे। जब वह शहर से पानी भर कर लौटे, तो आधी रात हो चुकी थी। हवा में हल्की ठंडक थी। गाँव में अजीब सी शांति थी, लेकिन यह सूखे की शांति नहीं थी। यह तूफान से पहले की शांति थी।
अचानक, रघूबीर के सूखे गालों पर एक ठंडी बूँद गिरी। फिर दूसरी… फिर तीसरी…
उन्होंने कनस्तर ज़मीन पर रखे और आसमान की ओर मुँह उठा लिया।
कुछ ही मिनटों में, आसमान जैसे फट पड़ा। मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। हवा में मिट्टी की वह सोंधी, मादक गंध फैल गई, जिसके लिए पूरा गाँव महीनों से तरस रहा था।
लोग अपनी झोपड़ियों से बाहर निकल आए। बच्चे कीचड़ में कूदने लगे। औरतें हँस रही थीं, रो रही थीं। भोला महतो बरगद के नीचे खड़े होकर नाच रहे थे।
रघूबीर भी मुस्कुरा रहे थे। उनके कनस्तर अभी भी भरे हुए थे, लेकिन अब उनकी ज़रूरत नहीं थी। वह जानते थे कि यह बारिश सिर्फ उनके खेतों को नहीं, बल्कि गाँव के टूटते रिश्तों और मरती उम्मीदों को भी सींच रही थी।
सूखा खत्म हो गया था। ज़िन्दगी फिर से शुरू होने वाली थी।
