बर्फ़ीली बगावत: शिमला का शह-मात
शीर्षक: गद्दी का खेल और सेबों की सियासत
शिमला के रिज (Ridge) पर हल्की बर्फ़बारी शुरू हो चुकी थी। माल रोड पर धुआँ उड़ाती कॉफ़ी के कप के साथ, राजनीतिक विश्लेषकों की बहस गर्म थी।
“इस बार ‘रिवाज’ (Rivaaj – हर पाँच साल में सरकार बदलने की परंपरा) टूटेगा या नहीं?” एक युवा पत्रकार ने पूछा।
एक अनुभवी संपादक ने अपनी ऐनक साफ़ करते हुए कहा, “बेटा, ये हिमाचल है। यहाँ की सियासत दिल्ली से नहीं, कोटखाई के सेब बागानों और कांगड़ा के चाय बागानों से तय होती है।”
यह बहस सिर्फ बहस नहीं थी, यह उस सियासी तूफ़ान की आहट थी जो मुख्यमंत्री वीरेंद्र परमार के सरकारी बंगले ‘ओकओवर’ के दरवाज़े पर दस्तक दे रहा था।
मुख्यमंत्री परमार, जिन्हें सब “राजा साहिब” कहते थे, अपनी जीत को लेकर आश्वस्त थे। उन्होंने पिछले पाँच सालों में सुरंगें (tunnels) बनवाई थीं, सड़कों का जाल बिछाया था और पर्यटन को खूब बढ़ावा दिया था। उन्हें लगता था, “विकास” के आगे सब फीका है।
लेकिन 500 किलोमीटर दूर, ऊपरी शिमला के रोहड़ू में, पार्टी के एक कद्दावर नेता, 70 वर्षीय जगत सिंह ठाकुर अपने बागान में बैठे थे। जगत सिंह सिर्फ एक विधायक नहीं थे, वे “सेब बेल्ट” की आत्मा थे। उनकी एक आवाज़ पर हज़ारों बागवान इकट्ठा हो जाते थे।
इस बार, पार्टी हाईकमान ने “युवा चेहरे” को मौका देने के नाम पर उनका टिकट काट दिया था।
जगत सिंह के पास उनके समर्थक बैठे थे। “ठाकुर साहिब, ये दिल्ली वाले हमें क्या समझते हैं? जिसने पार्टी को अपने खून से सींचा, आज उसी को दरकिनार कर दिया!” एक कार्यकर्ता ने गुस्से में कहा।
जगत सिंह ने अपने मुरझाए सेब के पेड़ को देखा और कहा, “पेड़ जब बूढ़ा हो जाता है, तो उसे काटते नहीं, उसकी कलम लगाते हैं। लेकिन ये लोग तो जड़ ही काटना चाहते हैं।” उनकी आवाज़ शांत थी, लेकिन फ़ैसला हो चुका था।
अगले दिन, शिमला में प्रेस कॉन्फ्रेंस हुई। जगत सिंह ठाकुर ने “बागवानों के सम्मान” के लिए निर्दलीय (Independent) लड़ने का ऐलान कर दिया।
विपक्ष के नेता, कुलदीप राणा, जो “ओपीएस” (Old Pension Scheme – पुरानी पेंशन योजना) की बहाली को अपना मुख्य हथियार बनाए हुए थे, तुरंत जगत सिंह से मिलने पहुँचे।
“ठाकुर साहिब,” राणा ने कहा, “आप हमारे साथ आइए। हम आपकी इज़्ज़त भी बहाल करेंगे और कर्मचारियों की पेंशन भी।”
जगत सिंह मुस्कुराए, “राणा साहिब, मैं अपनी लड़ाई खुद लड़ूँगा। हाँ, लेकिन मेरी जीत के बाद, जो भी ‘ओपीएस’ और ‘सेब’ का दाम सही देगा, शिमला का ताला वही खोलेगा।”
यह एक खुली चुनौती थी। हिमाचल की 68 सीटों वाली विधानसभा में, जहाँ अक्सर सरकार 2-3 सीटों के फासले से बनती-बिगड़ती है, वहाँ जगत सिंह का यह दांव ‘किंगमेकर’ बनने का था।
मुख्यमंत्री परमार ने इसे “बूढ़े शेर की आखिरी दहाड़” कहकर खारिज कर दिया। लेकिन उनकी पार्टी के रणनीतिकार जानते थे कि ऊपरी हिमाचल की कम से कम 5 सीटों पर जगत सिंह ने खेल बिगाड़ दिया था।
मतगणना का दिन।
सुबह से ही मुकाबला कांटे का चल रहा था। 34-34 पर सुई अटकी हुई थी। “रिवाज” कायम रहता दिख रहा था, लेकिन विपक्ष भी बहुमत से एक सीट दूर था।
तभी रोहड़ू का नतीजा आया। जगत सिंह ठाकुर 15,000 वोटों के भारी अंतर से जीत गए।
और सिर्फ वही नहीं, उनके समर्थन से दो और निर्दलीय भी जीत गए।
शाम तक तस्वीर साफ़ थी:
सत्तारूढ़ पार्टी: 32
विपक्षी पार्टी: 33
निर्दलीय (जगत सिंह गुट): 3
शिमला की ठंडी रात में राजनीतिक गर्मी अपने चरम पर थी। बहुमत का जादुई आँकड़ा 35 था, और उसकी चाबी जगत सिंह ठाकुर के पास थी।
मुख्यमंत्री परमार, जो कल तक जगत सिंह को “थका हुआ” बता रहे थे, अब खुद उन्हें फोन लगा रहे थे। “ठाकुर साहिब, आप हमारे वरिष्ठ हैं। जो आप कहेंगे, वो मंत्रालय…”
दूसरी तरफ, कुलदीप राणा का प्रस्ताव आया, “ठाकुर साहिब, ‘ओपीएस’ लागू, सेब का न्यूनतम समर्थन मूल्य भी लागू… और आपको ‘उप-मुख्यमंत्री’ का पद।”
जगत सिंह ठाकुर, शिमला के शोर-शराबे से दूर, अपने बागान में अलाव (bonfire) के सामने बैठे थे। उन्होंने दोनों फोन कॉल सुने।
उन्होंने अपने एक समर्थक से कहा, “देखा? ये सियासत है। कल तक जो हमें ‘खत्म’ मान रहे थे, आज वही ‘बादशाह’ बनाने को तैयार हैं। लेकिन इस बार गद्दी पर वो बैठेगा, जो दिल्ली का हुकुम नहीं, हिमाचल का हुकुम मानेगा।”
बर्फ़बारी तेज़ हो गई थी। शिमला का “रिवाज” तो बदल रहा था, लेकिन नई सरकार की स्क्रिप्ट अब दिल्ली में नहीं, रोहड़ू के उस सेब बागान में लिखी जा रही थी।
